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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 64
अशुभाशुभसंकल्पः संशान्तोऽस्मि निरामयः। नष्टेष्टानिष्टकलनः संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥
शुभ एवं अशुभ संकल्पों से मुक्त तथा सम्यक् रूप से शान्त होकर मैं आरोग्य अवस्था में स्थित हूँ। इष्ट तथा अनिष्ट के भाव का परित्याग करके मैं केवल संवित् रूप ही हो गया हूँ।
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