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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 89
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने। कालेऽपराह्ने भूयिष्ठे भिक्षाचरणमाचरेत् ॥
अग्नि-धूम्र एवं मूसल के शब्द से रहित, जिस जगह पर अग्नि बुझकर समाप्त हो चुकी हो तथा उपस्थित सभी लोग भोजन कर चुके हों, वहाँ पर ही योगी को मध्याह्न काल के पश्चात् भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
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