श्रोत्रियान्नं न भिक्षेत श्रद्धाभक्तिबहिष्कृतम्।
व्रात्यस्यापि गृहे भिक्षेच्छ्रद्धाभक्तिपुरस्कृते ॥
यदि श्रोत्रिय(वेदज्ञ)श्रद्धा और भक्ति से विहीन हो, तो उसके यहाँ भिक्षा स्वीकार नहीं करनी चाहिए।
इसके विपरीत, जो संस्कारविहीन(व्रात्य) होते हुए भी श्रद्धा और भक्ति रखता हो, उसके यहाँ भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
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