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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 81
श्रोत्रियान्नं न भिक्षेत श्रद्धाभक्तिबहिष्कृतम्। व्रात्यस्यापि गृहे भिक्षेच्छ्रद्धाभक्तिपुरस्कृते ॥
यदि श्रोत्रिय अर्थात् वेदज्ञ श्रद्धा-भक्ति से विहीन हो, तो उसके यहाँ भिक्षा नहीं स्वीकार करनी चाहिए तथा जो संस्कार विहीन (व्रात्य) भी यदि श्रद्धा-भक्ति रखता हो, तो उसके यहाँ भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
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