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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 3
संन्यासं पातयेद्यस्तु पतितं न्यासयेत्तु यः । संन्यासविघ्नकर्त्ता च त्रीनेतान्यति-तान्विदुः ॥
जो (व्यक्ति) संन्यास से पतित (गिर) हो जाते हैं, जो पतित को संन्यास की दीक्षा प्रदान करते हैं अथवा जो संन्यास धर्म ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करते हैं, वे तीनों ही (महा) पतित कहे गये हैं।
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