संन्यासं पातयेद्यस्तु पतितं न्यासयेत्तु यः ।
संन्यासविघ्नकर्त्ता च त्रीनेतान्यति-तान्विदुः ॥
जो व्यक्ति किसी संन्यासी को उसके संन्यासधर्म से पतित करता है, अथवा जो स्वयं पतित हुए व्यक्ति को अनुचित रूप से पुनः संन्यास प्रदान करता है,
और जो संन्यास में विघ्न उत्पन्न करता है — इन तीनों को ज्ञानीजन अत्यन्त दोषी मानते हैं।
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