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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 88
न वायुः स्पर्शदोषेण नाग्निर्दहनकर्मणा। नापो मूत्रपुरीषाभ्यां नान्त्रदोषेण मस्करी ॥
वायु हर किसी को स्पर्श करता है, अग्नि सभी को जलाता है, जल में सभी तरह के मल-मूत्रादि डाल दिये जाते हैं, फिर भी ये सभी इन दोषों के स्पर्श से प्रदूषित नहीं होते। इसी तरह संन्यासी भी किन्हीं अन्य दोषों से दूषित नहीं होता।
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