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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 86
उपस्थानेन यत्प्रोक्तं भिक्षार्थ ब्राह्मणेन तत्। तात्कालिकमिति ख्यातं भोक्तव्यं यतिभिः सदा ॥ सिद्धमन्त्रं यदा नीतं ब्राह्मणेन मठं प्रति। उपपन्नमिति प्राहुर्मुनयो मोक्षकाङ्क्षिणः ॥
भिक्षा के लिए निकलते समय (संन्यासी को) यदि कोई ब्राह्मण उसके समीप में आकर भोजन करने को कहे, तो उस 'तात्कालिक' भिक्षा को सदा ही स्वीकार कर सकता है। यदि कोई ब्राह्मण मठ (आश्रम) में सिद्ध (तैयार) करके भोजन ले आये, तो उसे साधु 'उपपत्र' भिक्षा कहते हैं।
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