घृत(आज्य) को रुधिर के समान तथा इकट्ठा किए हुए अन्न को मांस के समान त्याग देना चाहिए।
गन्ध एवं लेपन को गन्दी वस्तु के समान, नमक को अन्त्यज के समान, वस्त्र को जूठे पात्र के सदृश, तेल-मालिश को स्त्री-प्रसंग की भाँति, मित्रों की हँसी-मजाक को मूत्र के समान, घमण्ड को गौ-मांस के समान, परिचित-मित्रों के घर की भिक्षा को चण्डाल के सदृश, स्त्री को सर्पिणी के समान, सुवर्ण(सोने) को कालकूट के समान, सभा आदि को श्मशान के समान, राजधानी को कुम्भीपाक नरक के समान तथा एक ही घर के भोजन को मृतक-पिण्ड के समान जानकर इन सबका परित्याग कर देना चाहिए।
देवताओं का पूजन-अर्चन कभी नहीं करना चाहिए।
सांसारिक प्रपञ्चों का त्याग करके उसे जीवन्मुक्त बनना चाहिए।
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