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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 95
आज्यं रुधिरमिव त्यजेदेकत्रान्त्रं पललमिव गन्धलेपनमशुद्धलेपनमिव क्षारमन्त्यजमिव वस्त्रमुच्छिष्टपात्रमिवाध्यङ्ग स्त्रीसङ्गमिव मित्राह्लादकं मूत्रमिव स्पृहां गोमांसमिव ज्ञातचरदेशं चण्डालवाटिकामिव स्त्रियमहिमिव सुवर्ण कालकूटमिव सभास्थलं श्मशानस्थलमिव राज-धानीं कुम्भीपाकमिव शवपिण्डवदेकत्रान्नं न देवतार्चनम्। प्रपञ्चवृत्तिं परित्यज्य जीवन्मुक्तो भवेत् ॥
घृत (आज्य) को रुधिर के समान तथा इकट्ठा किये हुए अन को मांस की भाँति त्याग देना चाहिए। गन्ध एवं लेपन को गन्दी वस्तु के समान, नमक को अन्त्यज के समान, वस्त्र को जूठे पात्र के सदृश, तेल मालिश को स्त्री प्रसंग की भाँति, मित्रों की हँसी-मजाक को मूत्र के समान, घमण्ड को गौ-मांस के समान, परिचित-मित्रों के घर की भिक्षा को चण्डाल के सदृश, स्त्री को सर्पिणी के समान, सुवर्ण (सोने) को कालकूट के समान, सभा आदि को श्मशानवत्, राजधानी को कुम्भीपाक नरक के समान, एक ही घर के भोजन को मृतक-पिण्ड के समान जानकर इनका परित्याग कर देना चाहिए। देवताओं का पूजन-अर्चन कभी न करे। सांसारिक प्रपञ्चों को त्यागकर उसे जीवन्मुक्त बनना चाहिए।
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