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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 32
त्वचा क्षणविनाशिन्या प्राप्यो ऽप्राप्योऽयमन्यथा। चित्प्रसादोपलब्धात्मा स्पशों नाहमचेतनः ॥
इस प्रकार क्षणभर में नष्ट होने वाली तथा बनने-बिगड़ने वाली त्वचा भी मुझसे भिन्न है। मैं वह जड़ (अचेतन) स्पर्श नहीं हूँ, जो चैतन्य के प्रभाव से आत्मानुभूति प्राप्त करता है।
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