इस प्रकार क्षणभर में नष्ट होने वाली तथा बनने-बिगड़ने वाली त्वचा भी मुझसे भिन्न है।
मैं वह जड़(अचेतन)स्पर्श नहीं हूँ, जो चैतन्य के प्रभाव से आत्मानुभूति प्राप्त करता है।
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