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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 103
कत्थनं कुत्सनं स्वस्ति ज्योतिश्च क्रयविक्रयम्। क्रिया कर्मविवादश्च गुरुवाक्य-विलङ्घनम् ॥
खुशामद करना, निन्दा, कुशल, प्रश्र, खरीदने बेचने की बातें, क्रियाकर्म, वाद-विवाद, गुरु के वाक्य का उल्लंघन,
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