क्रमानुसार सभी का अभ्यास करके, सभी अनुभव लेकर, ज्ञान एवं वैराग्य के तत्त्व को अच्छी तरह से - जान करके, देह मात्र अवशिष्ट मानकर जो संन्यास-धर्म को ग्रहण करता है, 'वह ज्ञान वैराग्य संन्यासी' कहलाता है।
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