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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 21
क्रमेण सर्वमभ्यस्य सर्वमनुभूय ज्ञानवैराग्याभ्यां स्वरूपानुसंधानेन देहमात्रावशिष्टः संन्यस्य जातरूपधरो भवति स ज्ञानवैराग्यसंन्यासी ॥
क्रमानुसार सभी का अभ्यास करके, सभी अनुभव प्राप्त करके, ज्ञान एवं वैराग्य के तत्त्व को भली-भाँति जानकर तथा केवल देह मात्र को अवशिष्ट मानकर जो संन्यास-धर्म ग्रहण करता है, वह ज्ञान-वैराग्य संन्यासी कहलाता है।
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