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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 37
चैत्यवर्जितचिन्मात्रमहमेषोऽवभासकः । सबाह्याभ्यन्तरव्यापी निष्कलोऽहं निरञ्जनः । निर्विकल्पचिदाभास एक आत्मास्मि सर्वगः ॥
मैं (संन्यासी) चैतन्य से भी परे चिन्मात्र प्रकाश से युक्त हूँ। मैं बाह्य एवं अन्तः में संव्याप्त रहने वाला निष्कल (कलारहित), निरज्जन, निर्विकल्प, चिदाभास एवं सर्वत्र व्याप्त रहने वाला आत्मतत्त्व हूँ।
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