मैं (संन्यासी)चैतन्य से भी परे चिन्मात्र प्रकाश से युक्त हूँ।
मैं बाह्य एवं अन्तः में सर्वव्याप्त रहने वाला निष्कल(कलारहित), निरञ्जन, निर्विकल्प, चिदाभास तथा सर्वव्यापी आत्मतत्त्व हूँ।
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