इसी कारण विद्या के अभ्यास में प्रमाद करना ही दिन में शयन करना कहा गया है।
आध्यात्मिक कथा के अतिरिक्त भिक्षा की बात अथवा अनुग्रह-परिप्रश्न(उत्तर देने) के अतिरिक्त जो भी वार्ता की जाए, उसे व्यर्थ वार्तालाप माना जाता है।
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