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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 101
विद्याभ्यासे प्रमादो यः स दिवास्वाप उच्यते। आध्यात्मिक कथां मुक्त्वा भिक्षावार्ता विना तथा। अनुग्रहं परिप्रश्नं वृधाजल्यो ऽन्य उच्यते ॥
इस कारण से विद्या के अभ्यास में प्रमाद बरतना दिन में शयन करना कहा जाता है। आध्यात्मिक कथा को छोड़कर भिक्षा की बात, अनुग्रह परिप्रश्न (का उत्तर देने) के अतिरिक्त और जो बात की जाये, यह बेकार का बोला जाना समझा जाता है।
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