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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 77
भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नाशी भवेत्क्वचित्। निरीक्षन्ते त्वनुद्विग्नास्तद्‌गृहं यत्नतो व्रजेत् ॥
(संन्यासी) सतत भिक्षावृत्ति पर ही आश्रित रहे। हमेशा एक ही घर से भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिए। जो शान्त-भाव से उसकी राह देखते हों, उन्हीं के यहाँ प्रयासपूर्वक भोजन के लिए जाना चाहिए।
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