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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 4
अथ षण्डः पतितोऽङ्ग‌विकलः स्त्रैणो बधिरोऽर्भको मूकः पाषण्डश्चक्री लिङ्गी कुष्ठी वैखानसहरद्विजौ भृतकाध्यापकः शिपिविष्टोऽनग्निको नास्तिको वैराग्यवन्तोऽप्येते न संन्यासार्हाः । संन्यस्ता यद्यपि महावाक्योपदेशे नाधिकारिणः ॥
नपुंसक, पतित, अंगहीन, स्त्रैण स्वभाव वाला, बहरा, बालक, मूक, पाषण्डी, चक्रधारी सम्प्रदाय का अनुयायी, लिङ्गधारी, कुष्ठरोगी, वैखानस और हरद्विज, वेतन लेकर अध्यापन करने वाला, शिपिविष्ट, अनग्निक तथा नास्तिक — ये सभी, चाहे वैराग्य से युक्त ही क्यों न हों, संन्यास ग्रहण करने के अधिकारी नहीं माने गए हैं। और यदि ये किसी प्रकार संन्यास ग्रहण भी कर लें, तो भी वे महावाक्योपदेश (उपनिषदों के परम ब्रह्मविद्या-उपदेश) के अधिकारी नहीं होते।
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