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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 49
सुलभश्चायमत्यन्तं सुज्ञेयश्चाप्तबन्धुवत् । शरीरपद्मकुहरे सर्वेषामेव षट्पदः॥
यह (आत्मा) सुलभ है, आत बन्धु के सदृश है एवं शरीर रूपी कमल पुष्प में भ्रमर की भाँति है।
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