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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 67
कदोपशान्तमननो धरणीधरकन्दरे। समेष्यामि शिलासाम्यं निर्विकल्पसमाधिना ॥
पर्वत-श्रृंखला की गुफा में आसन ग्रहण करके शांत भाव से कब चिन्तन-मनन करूँगा। मैं निर्विकल्प समाधि लगाकर शिला के समान कब चेष्टारहित हो जाऊँगा?
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