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अध्याय 3 — तृतीय पटल
शिव संहिता
119 श्लोक • केवल अनुवाद
प्रत्येक प्राणी के हत्प्रदेश में दिव्य चिह्नों से युक्त एक दिव्य कमल की अवस्थिति रहती है। यह कमल 'क' वर्ण से लेकर 'ठ' वर्ण तक बारह अक्षरों से शोभायमान रहता है। अर्थात् कमल में क्रमशः क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, जझ, ञ, ट और ठं वर्ण उसकी बारह पंखुडियों पर नामांकित रहा करते हैं।
इसी कमल में अनादि कर्म से परिप्लुत तथा अहंकारपूर्ण वासना से परिपूरित प्राण का निवासस्थल माना जाता है।
इस शरीर में प्राण के वृत्तिभेद से जो अनेक नामसंज्ञक वायु वर्तमान रहते हैं उन सभी का उल्लेख करने में मैं सर्वदा ही अपने को असमर्थ पाता हूँ। अर्थात् उन समस्त वायुओं का नामोल्लेख करना यहाँ अनावश्यक है।
अतः उनमें जिनकी प्रमुखता है उन्हें ही यहाँ बतलाया जा रहा है। प्राण के दश भेद इस प्रकार से हैं, जैसे - प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय।
शास्त्रों में वर्णित उक्त दश प्राण ही प्रमुख माने गये हैं। ये समस्त वायु अपने-अपने कर्मों से प्रेरित होकर शरीर में क्रियाशील रहते हैं।
उक्त कथित दश वायुओं में भी पाँच वायुओं (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) की विशेष रूप से महत्ता रहती है, किन्तु मैंने यहाँ केवल प्राण और अपान - इन दो को ही कहे है।
अब यहाँ पंच प्राणों के वासस्थान तथा अन्य पाँच वायुओं के कार्यक्षेत्र का कथन किया जा रहा है जो इस प्रकार से है - हृत्प्रदेश में प्राणवायु, गुदाद्वार में अपान वायु, नाभिस्थल में समान वायु, कंठप्रदेश में उदान वायु तथा सम्पूर्ण शरीर में व्यान वायु परिव्याप्त होकर भ्रमणशील रहता है।
इनके अतिरिक्त नागादि पंचवायुओं का कार्य क्रमशः डकार, हिक्का (हिचकी), जृम्भा (जंभाई लेना), क्षुधा-पिपासा तथा उन्मीलन अर्थात् निद्रितावस्था में नेत्र-पटलों को बन्द कर देना होता है।
इस प्रकार जो व्यक्ति इस शरीर को ब्रह्माड रूप समझ लेता है, वह सभी पापों से रहित होकर निर्वाणपद प्राप्त कर लेता है। इस रीति से सद्यः योगसिद्धि सुलभ हो जाती है।
इस प्रक्रिया को जानने वाला योगाभ्यासी योगसाधना काल में किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं करता। इसका तात्पर्य यह है कि योगसाधना की प्रक्रिया का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर साधक को कष्ट नहीं झेलना पड़ता, किन्तु अज्ञानता की अवस्था में योगसाधना करना साधक के लिए कष्टप्रद सिद्ध होता है।
गुरुमुख से श्रवण की हुई विद्या निश्चय ही फलवती सिद्ध होती है। गुरुवाणी से रहित विद्या सर्वदा ही निष्क्रिय और फलविहीन होती है। यदि गुरुज्ञान से हीन योगाभ्यासी किसी के अनुकरणवश योग साधन करने लगे तो वैसी साधना उसके लिए कष्टकारिणी बन जाती है।
किन्तु जो विद्या गुरु की परितुष्टि से प्राप्त की जाती है वह शीघ्र ही सिद्धिदायिनी तथा सफलताकारिणी होती है।
निस्सन्देह रूप से गुरु ही पिता, माता और देवस्वरूप होता है। अतः शिष्य को मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु की सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिए।
गुरु की प्रसन्नता के फलस्वरूप आत्मा का कल्याण होता है। अतएव निश्छल भाव से गुरु की नित्य ही सेवा करनी चाहिए। अश्रद्धान्वित होकर की जाने वाली गुरु की सेवा से कोई लाभ नहीं होता।
अपने गुरु की तीन बार प्रदक्षिणा करके दाहिने हाथ से उनके शरीर का स्पर्श कर उनके चरण-कमलों में साष्टांग प्रणाम करना चाहिए।
इस प्रकार श्रद्धासमन्वित होकर कार्य करने वाले शिष्य को अवश्य ही सिद्धि मिलती है, किन्तु इसके विपरीत अश्रद्धालु को कभी भी सफलता नहीं मिलती। प्रत्येक साधक को चेष्टावान् होकर अपनी साधना पूर्ण करनी चाहिए। साष्टांग प्रणाम निवेदित करने का विधान शास्त्रों में निम्न प्रकार से किया गया है-
अर्थात् पैर, जाँध, हृदय, शिर, दृष्टि, मन तथा वक्षःस्थल - इन आठ अंगों से जो प्रणाम किया जाय उसे अष्टांग प्रणाम कहा जाता है। किन्तु यह साष्टांग प्रणाम केवल पुरुषों के लिए ही करणीय होता है, महिलाओं को इस प्रकार का प्रणाम करना वर्जित है।
जो पुरुष सांसारिक कार्यों में निरत रहने वाले व्यक्तियों से अत्यधिक सम्पर्क रखते हैं तो उनसे भी सिद्धियाँ दूर रहती हैं। इसी प्रकार अविश्वासी तथा अश्रद्धालु पुरुष भी सिद्धियों को प्राप्त करने से वंचित रह जाया करते है।
मिथ्यावादी, कर्कश वाणी बोलने वाले तथा गुरु के परितोष का ध्यान न रखने वाले व्यक्तियों की भी यही दशा होती है। अर्थात् वे सिद्धि-प्राप्ति हेतु सदा ही अयोग्य साबित होते हैं।
योगशास्त्र में सिद्धि-प्राप्ति के छह लक्षण बतलाये गये हैं जो इस प्रकार से हैं - (१) मन में विश्वास की भावना, (२) श्रद्धावान होना, (३) गुरु-पूजा परायणता,
(४) समस्त प्राणियों में समभाव, (५) इन्द्रियों का दमन तथा (६) संतुलित आहार-ग्रहण। ये ही छह लक्षण मुख्यतया कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त कोई सातवाँ लक्षण नहीं होता।
साधक को किसी योगवेत्ता गुरु से योगोपदेश लेकर उनके द्वारा कथित विधानानुसार निश्चयात्मक बुद्धि से साधना में तल्लीन रहना चाहिए।
उसे साधना हेतु किसी ऐसे मठ का चयन करना चाहिए जो सुन्दर और साफ-सुथरा हो तथा दीवारों में छोटे छिद्र हों। ऐसे स्थान में साधक पद्मासन लगाकर बैठ जाय और वहीं प्राणायाम का अभ्यास प्रारम्भ कर दें।
सर्वप्रथम अपने शरीर को एक सीध में रखकर करबद्ध हो गुरु को प्रणाम करना चाहिए। पुनः दाएँ-बाएँ पार्श्व में विघ्नहर्ता गणेशजी को, क्षेत्रपाल को तथा जगज्जननी देवी अम्बिका को प्रणाम करे।
तदनन्तर दाहिने हाथ के अँगूठे द्वारा पिंगला नाड़ी (दायाँ नासिकारन्ध्र) को रोककर इड़ा नाड़ी (चन्द्रनाड़ी, वाम नासापुट) से वायु को शक्त्यानुसार ऊपर की ओर खींचकर कुछ क्षण तक उसे रोके रहें। पुनः उसे पिंगला नाड़ी (सूर्यनाड़ी) द्वारा धीरे-धीरे बहिर्गत कर दें। अर्थात् वाम नासा से पूरक प्राणायाम (श्वास को ऊपर की ओर खींचना) करने के पश्चात् कुम्भक प्राणायाम (कर्षित वायु को रुद्ध करना) करें। तत्पश्चात् वाम नासिका से रेचक प्राणायाम (दाएँ नासारन्ध्र से। शनैः शनैः अवरुद्ध वायु का निष्कासन) करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि पूरक, कुम्भक और रेचक - ये तीनों ही प्राणायाम के अभिन्न अंग मानें गये हैं।
इस प्रकार बारम्बार पिंगला नाड़ी (दायां नासापुट) से पूरक प्राणायाम करे। पुनः इडा नाड़ी (वाम नासापुट) से वायुः का कर्षण करके कुम्भक प्राणायाम की क्रिया सम्पन्न करे।
तत्पश्चात् इड़ा नाड़ी से अवरुद्ध वायु का निष्कासन धीरे-धीरे करें। वायु को निकालते समय शीघ्रता न करें। इस रीति से बीस बार आलस्यरहित होकर कुम्भक प्राणायाम करने वाला साधक सभी द्वन्द्वों से विमुक्त हो जाता है। अभिप्राय यह है कि कुम्भक प्राणायाम का अभ्यास क्रमशः बढ़ाता हुआ उस पर अपना आधिपत्य कर ले तो वह समस्त क्लेशों से छूट जाता है।
इस रीति से नित्यप्रति प्रातः, मध्याह्न, सायंकाल तथा आधीरात में अर्थात् कुल चार बार साधक को प्राणायाम करने चाहिए।
उक्त कथित रीति से आलस्यविहीन होकर निरन्तर दो मास तक नियमपूर्वक प्राणायाम करने के परिणामस्वरूप साधक के नाड़ी-मल का परिष्कार हो जाता है।
तत्वदर्शी योगी की नाड़ी का परिशोधन हो जाने पर उसके सभी विकार मिट जाते हैं और योगसाधना का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
नाड़ी का शुद्धिकरण होने के पश्चात् योगी में जो लक्षण प्रकट होते हैं उन्हें मैं संक्षेपतया कह रहा हूँ।
नाड़ीशुद्धि के पश्चात् योगी का शरीर साम्यावस्था में आ जाता है। अर्थात् उसकी देह में स्थूलता, दुर्बलता या वक्रता नहीं रह जाती और सभी अंग एक समान दीख पड़ने लगते हैं।
उसके शरीर में सुगन्धि तथा मुखमण्डल पर तेजस्विता की कान्ति झलकने लगती है। ऐसी अवस्था आने पर उसके स्वर में भी मिठास आ जाती है। इन प्रारम्भिक लक्षणों के साथ-साथ उसे योग का पूर्णरूपेण ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इसी को योगावस्था भी कहा जाता है।
प्राणवायु की सिद्धि होने पर पूर्व कधित सभी लक्षण आरम्भिक काल में पाये जाते हैं। अब मैं उनसे मिलने वाले उस लाभ का कथन करता हूँ जिससे समस्त दुःखों का नाश हो जाता है।
ऐसे योगी में जठराग्नि की प्रज्वलिता, अंग-सौष्ठव, आहार-आह्यता, हर्षोल्लासिता एवं मन की प्रसन्नता उत्पन्न हो जाती है।
अब मैं उन विघ्नकारी कारकों का वर्णन करता हूँ जिसके परित्याग से योगी इस संसार-सागर से पार चला जाता है।
योगी के लिए खट्टे, रूखे, तीक्ष्ण, नमकीन, सरसों आदि पदार्थों का सेवन, कहुए पदार्थ का भोजन, अत्यधिक भ्रमण, प्रातः स्नान तथा शरीर में तैलादि का मर्दन करना निषिद्ध है।
किसी की वस्तु की चोरी करना, जीवहिंसा, मानव के प्रति विद्वेष, अहंकार, प्राणिमात्र के प्रति प्रेग्राभाव, व्रतोपवास, मिथ्या भाषण, मोहग्रस्तता, प्राणों का परिपीड़न,
स्त्री-संसर्ग, अग्नि-सेवन, वाचालता, प्रिय-अप्रिय भाषण तथा अतिभोजन योगी के लिए सर्वदा ही अग्राह्य हैं। उसे इनका परित्याग अवश्य ही कर देना चाहिए।
अब मैं योगसाधना में शीघ्र ही सिद्धिलाभ के उपाय का कथन कर रहा हूँ। इसे सर्वदा ही गुप्त रखना चाहिए।
योगाभ्यासी को घी, दूध, मिठाई, पान-सुपारी तथा चूर्ण से रहित आहार लेने चाहिए। उसे कभी भी उत्तेजक पदार्थ, जैसे - कपूर आदि नहीं खाने चाहिए। योगी को कर्कश वाणी का परित्याग कर मधुर वाणी का अभ्यासी बनना चाहिए। साधक को उत्तम कुटिया और स्वस्थ वातावरण में निवास करते हुए महीन वस्त्र पहनने चाहिए। अर्थात् सादे वेश-भूषा में रहना ही उसे आवश्यक होता है।
योगाभ्यासी पुरुषों के लिए नित्य वेदान्त-वाक्यों का श्रवण, वैराग्य भाव का धारण तथा ईश्वर नामस्मरण करना उचित है।
उसे मांगलिक वचनों का श्रवण, धैर्य, क्षमा, तप, शुचिता तथा लज्जा का भाव रखना आवश्यक बतलाया गया है। गुरु की सेवा में निरन्तर निरत रहकर कथित नियमों का अनुपालन करना आवश्यक होता है। इस प्रकार का साधक अल्पकाल में ही सिद्धि को पा लेता है।
योगी को दक्षिण नासापुटस्थ पिंगला नाड़ी (सूर्यनाड़ी) के प्रवहमान रहने पर भोज्य पदार्थों का ग्रहण तथा वाम नासापुटस्थ इड़ा नाड़ी (चन्द्रनाड़ी) के प्रवाहित रहने पर शयन करना उचित कहा गया है।
उसे भोजनोपरान्त तत्काल ही अथवा क्षुधातुर रहने पर खाली पेट अभ्यास करना वर्जित है, क्योंकि ऐसा करना हानिकारक सिद्ध होता है। अभ्यास-काल से पूर्व उसे घी और दूध का सेवन करना उपयोगी होता है।
योगाभ्यास में दृढ़ता आ जाने पर उसे कथित नियमों के पालन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। उसे बार-बार अल्प मात्रा में भोज्य पदार्थ ग्रहण करते रहना चाहिए।
इस प्रकार प्रतिदिन कुम्भक प्राणायाम का अभ्यास करते रहने से कुम्भक की सिद्धि मिल जाती है। तत्पश्चात् उसमें वायुधारण की यवेष्ट शक्ति आ जाती है।
योगी में वायुधारण की यथेच्छ शक्ति आ जाने पर उसका कुम्भक सिद्ध हो जाता है अर्थात् वह समस्त कार्यों में सामर्थ्यवान् बन जाता है। उसके लिए कुछ भी दुष्यप्य नहीं रह जाता।
प्रथम बार के अभ्यास-काल में अभ्यासी के शरीर से पसीना छूटने लगता है।
उस क्षण उसके लिए यह आवश्यक होता है कि वह देहनिर्गत पसीने को शरीर में ही मलकर सुखा ले। यदि वह ऐसा करने से हिचकता है तो उसके शरीरस्थ धातुओं का विनाश हो जाता है।
साधक द्वारा दूसरी बार अभ्यास किये जाने पर उसकी देह में कंपकपी तथा तीसरी बार में मेंढकी चाल उत्पन्न हो जाती है।
अर्थात् जिस प्रकार मेंढक भूमि से ऊपर उछल-कूदकर पुनः धरती पर आ जाता है वैसे ही योगाभ्यासी का आसन भी किंचित् ऊपर उठकर पुनः अपने स्थान पर स्थिर हो जाता है। अभ्यास के दृढ़तर हो जाने पर साधक स्वेच्छानुसार गगनचारी बन सकता है।
योगसिद्धाभिलाषी के लिए शास्त्रोक्त नियमों का अनुपालन उस समय तक अनिवार्य होता है जब तक उसे यथेच्छ वायुधारण की शक्ति, अल्पकालिक निद्रा तथा अल्प परिमाण में मल-मूत्र का निस्सरण न होने लगे। अर्थात् जब उसमें निद्रा की अनुभूत्ति कम हो तथा मल-मूत्र के निस्सरण की मात्रा भी घट जाय तो उसे योगसिद्धि की ओर उत्तरोत्तर अग्रसर होते हुए जानना चाहिए।
तत्ववेत्ता योगियों में शारीरिक और मानसिक व्यथा का बोध नहीं होता और न तो उसके शरीर से पसीना ही छूटत्ता है। मुख से लार भी नहीं टपकती और न ही उसमें उदरकृमियों की उत्पत्ति होती है।
उसके शरीर में कफ, पित्त और वात - इन तीनों की दोषग्रस्तता भी नहीं होती। पूर्व निर्धारित काल तक योगी को भोजनादि ग्रहण में संयम रखने चाहिए।
ऐसी अवस्था में साधक द्वारा अतिभोजन या लघुभोजन किये जाने पर भी उसे कष्ट का अनुभव नहीं होता, बल्कि अभ्यास के फलस्वरूप उसमें भूचरी विद्या की सिद्धि आ जाती है। अर्थात् जिस प्रकार मेढ़क अपने हाथ पटककर भूमि में प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार योगी भी हस्तताड़नमात्र से ही भूमि में प्रवेश कर जाता है।
योगसाधना काल में साधक के समक्ष ऐसी अनेक प्रकार की बाधाएँ आती रहती हैं जिनका निवारण करना अत्यन्त दुष्कर होता है। ऐसी स्थिति में भी साधक को निराश न होकर अपनी साधना में तब तक संलग्न रहना चाहिए जब तक प्राण कंठ तक न आ जाय।
अपने सम्मुख उपस्थित विघ्नों के शमनार्थ साधक को अपनी इन्द्रियों का दमन करना आवश्यक होता है। इसके साथ ही उसे किसी एकांत स्थान में बैठकर उच्च स्वर से प्रणव मंत्र का जाप मन लगाकर करना उचित है।
योगाभ्यासी साधक पूर्व जन्मार्जित तथा वर्तमानकालिक कृत समस्त कर्मों का प्राणायाम के द्वारा विनाश कर डालता है। अतः प्राणायाम के बल पर योगी के लिए समस्त कर्मों का विनष्टीकरण कर देना सम्भव हो जाता है।
उत्तम योगी अपने पूर्वार्जित पाप-पुण्य के कर्म-समूहों का नाश केवल सोलह प्राणायाम के द्वारा ही कर डालता है। प्राणायाम के फलस्वरूप पाप-पुंज उसी भांति जलकर राख हो जाते हैं जिस प्रकार आग में पड़कर तिनका भस्म हो जाता है।
प्राणायाम द्वारा पापरहित योगी अपने पुण्यकर्मों का भी उसी अग्नि में आहुति दे देता है। तात्पर्य यह है कि सभी पाप-पुण्य कर्मों का पूर्णरूप से क्षय हो जाता है। जब कुछ भी फलभोग शेष नहीं रह जाता तभी उसे मोक्ष की उपलब्धि होती है।
उत्तम योगाभ्यासी पुरुष प्राणायाम की महत्ता के फलस्वरूप अष्टसिद्धियों (अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व तथा वशित्व) को हस्तगत कर इस संसार-सागर से पार चला जाता है और तब वह त्रैलोक्यं में अपनी इच्छा के अनुसार परिभ्रमण कर सकता है। यहाँ अष्टसिद्धियों की प्राप्ति का उल्लेख क्रमशः नीचे किया जा रहा है। अणिमा - मन में इच्छा करते ही शरीर को परमा परमाणु के समान सूक्ष्मतम बना लेना। गरिमा - हलका होते हुए भी इच्छामात्र से पर्वत से भी अधिक भारवान हो जाना। ईशित्व - सम्पूर्ण भौतिक पदार्थों के निर्माण एवं विनष्टीकरण की क्षमता का होना। महिमा - इच्छामात्र से शरीर को विस्तृत कर लेना ही महिमा सिद्धि कहलाती है। लघिमा - अत्यधिक भारवान होकर भी हलका-फुल्का प्रतीत होना प्राप्ति-मनोनुकूल पदार्थों की तत्क्षण होने वाली उपलब्धि। प्राकाम्य - संकल्पमात्र से अभिलषित वस्तु की परिपूर्णता। वशित्व - किसी को अपने वशवर्ती बना लेने की समर्थता।
प्राणायाम के क्रमानुसार अभ्यासी पुरुष में जब तीन घड़ी (घटी) तक प्राणवायु के अवधारण की शक्ति उत्पन्न हो जाय तो वह अपनी इच्छानुसार सभी सिद्धियों को प्राप्त कर लेने में समर्थ हो जाता है। यह बात निश्चित रूप से सत्य है।
ऐसे योगी में स्वेच्छाचरण की समर्थता, किसी दूरस्थ वस्तु की दर्शन-शक्ति, दूरगामी शब्दों की श्रवण-शक्ति, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम पदार्थ के अवलोकन की शक्ति तथा किसी अन्य व्यक्ति के शरीर में प्रविष्ट होने की शक्ति भी आ जाती है।
कुम्भक प्राणायाम की सिद्धि पा लेने वाले योगी में धातु-परिवर्तन की शक्ति भी आ जाती है। यदि वह अपने मल-मूत्र का लेपन स्वर्ण से इतर किसी अन्य धातु पर कर दे तो वह धातु निश्चय ही स्वर्ण बन जाता है।
उसमें किसी की आँखों से ओझल होने (अदृश्यता) तथा आकाशगमन करने की क्षमता भी आ जाती है। ऐसी अवस्था को घटावस्था कहते हैं। अर्थात् ऐसी स्थिति में योगी के लिए संसार की कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह जाती।
घटावस्था का आशय यह होता है कि जब योगी में प्राण, अपान, नाद, बिन्दु, जीवात्मा तथा परमात्मा का सन्निवेश एक साथ हो जाय।
योगी में एक प्रहर (३ घण्टा) तक वायुधारण की शक्ति उत्पन्न होने पर उसमें प्रत्याहार (योग का एक अंग) की शक्ति आ जाती है जिसके फलस्वरूप साधन में कोई अन्तर नहीं रहता, यह बात सुनिश्चित है।
योगी में जिन-जिन पदार्थों का ज्ञान हो, उसे उन-उन पदार्थों में आत्मभावना रखनी चाहिए। जिस इन्द्रिय की सहायता से जिस वस्तु का बोध होता हो, उसमें आत्मभाव रखने से इन्द्रिय पर विजयश्री मिलती है। अर्थात् जिस प्रकार नेत्र के द्वारा रूप, कर्ण के द्वारा शब्द या प्राण के द्वारा गंधादि का बोध होता है उसी प्रकार उन सब में आत्मभाव रखने पर वे इन्द्रियाँ अपने विषयों का ग्रहण नहीं करेंगी। तात्पर्य यह है कि विषयों से विमुख रहने पर स्वतः ही इन्द्रियों पर विजय-लाभ हो जायगा।
एक बार में कुम्भक प्राणायाम द्वारा आठ घटी (३ घण्टा) तक प्राणवायु को रोक रखने वाला योगी पैर के अंगूठे पर निश्चल भाव से खड़ा रह सकता है।
किन्तु उसे इस अलौकिक शक्ति की गोपनीयता बनाये रखने के लिए अपनी विक्षिप्तावस्था प्रकट करनी चाहिए। अर्थात् योगी को अपनी शक्तिसम्पन्नता का प्रदर्शन कदापि नहीं करना चाहिए।
तत्पश्चात् निरन्तर अभ्यास-रत रहने वाले योगी में परिचयावस्था का आविर्भाव हो जाता है। जिस समय वायु इड़ानाड़ी (चन्द्रनाड़ी) पिंगला नाड़ी (सूर्यनाड़ी) का परित्याग कर अचल हो उठता है तब वह परिचित वायु सुषुम्ना मार्ग से आकाश में संचरण करने लगता है। ऐसी स्थिति में क्रियाशक्तिग्राही योगी चक्रभेदन में निश्चय ही सामर्थ्यवान बन जाता है।
अर्थात् परिचयावस्था में योगी षट्चक्र (आज्ञाचक्र, विशुद्धचक्र, अनाहत चक्र, मणिपूरचक्र, स्वाधिष्ठान चक्र तथा मूलाधार चक्र) भेदन में अवश्य ही सक्षम हो जाता है। ऐसी अवस्था की प्राप्ति अभ्यास के द्वारा ही सम्भव हो सकती है।
अभ्यास के परिणामस्वरूप योगी में परिचयावस्था आ जाने पर वह निश्चित रूप से त्रिकूट कर्मों को देखने में सफल हो सकता है। त्रिकूट कर्म के तीन भेद कहे गये हैं, जैसे - आध्यात्मिक (मानसिक क्लेश), आधिभौतिक (भूत-प्रेत पिशाचादि से मिलने वाला कष्ट) और आधिदैविक (कर्म फलानुसार देवताओं से होने वाला कष्ट)।
योगी में इन त्रिकूट कर्मों का बोध हो जाता है जिसे वह ओंकार मंत्रजाप के फलस्वरूप विनाश करने में भी सक्षम हो जाता है। यदि वह पूर्व जन्मार्जित कर्मफलों के भोगने का अभिलाषी हो तो उसे अपनी इच्छा के अनुसार भोग भी सकता है।
योगी द्वारा पाँच प्रकार की धारणा की सिद्धि हो जाने पर उसमें पंचभूतों की धारणा भी सिद्ध हो जाती है। पंचभूतों की सिद्धि मिल जाने के पश्चात् उसे भूतों से कोई भय नहीं रह जाता।
वायुधारण के अभ्यास का विधान यह है कि सर्वप्रथम आधारचक्र, पुनः उससे ऊपर स्वाधिष्ठानचक्र, मणिपूरचक्र, अनाहतचक्र, विशुद्धचक्र और आज्ञाचक्र में क्रमश पाँच-पाँच घटी (२-२ घंटे) तक वायुधारण करने का अभ्यासी बने।
इस प्रकारः गुदाद्वार, शिश्न, नाभिस्थल, हृदय, कण्ठप्रदेश और भौहों के मध्य स्थित षट्चक्रों में वायुधारण के अभ्यास को सिद्ध कर लेने वाला योगी अविनश्वर हो जाता है। अर्थात् उसका विनाश पंचभूतों के द्वारा कभी सम्भव नहीं होता।
इस प्रकार पंचभूतों को दृढ़ाभ्यासी योगी के निकट मृत्यु सौ ब्रह्माओं का आयुकाल पूर्ण हो जाने पर भी नहीं जाती।
इस प्रकार के निरन्तराभ्यास द्वारा योगी में निष्पत्यावस्था आ जाती है। वह अनन्त काल से अंकुरित हुए कर्म-बीज को नष्ट कर अमृतपान करने में समर्थ हो जाता है।
अपने अभ्यासरूप कर्म द्वारा जब योगी में सम्राधि-ज्ञान उत्पत्र हो जाता है तब वह समाधि में निमग्न हो जाया करता है।
योगी में इस प्रकार की निष्पत्यावस्था आ जाने पर उसकी समाधि भी इच्छा के अनुरूप होती है।
वह समाधि की अवस्था में जिसका चिन्तन करता है उसी में उसके चित्त का विलय भी हो जाया करता है। ऐसा योगाभ्यासी मन, वायु और क्रियाशक्ति के साथ सभी चक्रों का भेदन कर अन्त में ब्रह्मज्ञान में समाहित हो जाता है।
देवी पार्वती से शिवजी कहते हैं कि हे देवि! अब मैं सम्पूर्ण क्लेशनिवारक प्राणवायु के उस विधि को बतलाता हूँ जिसके द्वारा सांसारिक रोगों का अवश्य ही विनष्टीकरण हो जाता है।
यदि प्रबुद्ध साधक अपनी जिह्वा को पलटकर तालुमूल में लगा ले और प्राणवायु का पान करे तो उसके सभी रोगों का विनाश सुनिश्चित रहता है।
यदि प्राण-अपान का विधि-विधिज्ञ साधक अपने होंठ को कौए की चोंच के समान लम्बोतरा बनाकर शीतलं वायु को पान करे तो वह निश्चय ही मोक्ष का अधिकारी हो जाता है।
जो पुरुष विधानपूर्वक नित्यप्रति रसान्वित वायु का पान करता है, उसके श्रम (परिश्रम से उत्पत्र होने वाली थकावट), दाह (शारीरिक जलन) तथा जरा (वृद्धावस्था) आदि सभी रोग निर्मूल हो जाते हैं। अर्थात् उसे उक्त प्रकार के कष्टदायक रोग नहीं झेलने पड़ते।
जो योगी अपनी जिह्वा को ऊपर की ओर उठाकर चन्द्रमा से स्रवित होते हुए अमृत का रसास्वादन करता है वह निश्चित रूप से एक महीने के अन्दर ही मृत्यु पर विजय पा लेता है। जीभ को उलटकर गलघंटिका के पीछे तालुमूल में लगाकर उससे टपकते हुए अमृत का पान करना खेचरी मुद्रा कहलाती है।
अपने निचले दाँत से राजदन्त को दबाकर उसके छिद्र से विधिपूर्वक वायुपान तथा कुण्डलिनी देवी का ध्यान करने वाला साधक छह महीने में ही कवि बन जाता है।
उक्त कथित काकचंचु की मुद्रा द्वारा दोनों सन्ध्याओं में कुंडलिनी की मुखाकृति का ध्यान करता हुआ प्राणवायु का पान करने वाला साधक क्षयरोग (तपेदिक, टी.बी.) से शीघ्र हीं मुक्त हो जाता है।
जो योगसाधक काकचंचु मुद्रा की सहायता से दिन-रात प्राणवायु का पान किया करता है उसके सभी रोग निःसन्देह रूप से विनष्ट हो जाते हैं। उसमें दूर की बातें सुनने तथा दूर तक देखने की शक्ति भी आ जाती है। ऐसा योगी सूक्ष्म से सूक्ष्मतर पदार्थों के अवलोकन में भी सक्षम हो जाता है।
जो प्रबुद्ध पुरुष दाँत से दाँत का संपीड़न कर तथा जीभ को ऊपर उठाकर धीरे-धीरे प्राणवायु को पीता है वह शीघ्र ही मृत्यु को विजित कर दीर्घायु बन जाता है।
इस प्रकार का अभ्यास प्रतिदिन करने वाला व्यक्ति छह महीने में ही समस्त पापों से रहित होकर सभी रोगों का उन्मूलन कर डालता है।
उक्त प्रकार का अभ्यास निरन्तर एक वर्ष तक करने वाला साधक निश्चय ही मृत्यु को विजित कर लेता है। अतः योगसाधक को इस क्रिया की अवश्य ही साधना करनी चाहिए।
ऐसी साधना लगातार तीन वर्ष तक करने वाला भैरव के समान पराक्रमी होकर अणिमादिक अष्टसिद्धियों को हस्तगत कर लेता है। साधक के अधीन समस्त प्राणी स्वतः ही हो जाया करते हैं।
यदि योगी अपनी जिह्वा का क्षणार्थ मात्र पलटकर तालुमूल में लगा ले तो वह सभी रोगों से विमुक्त होकर वृद्धावस्था पर विजय पा लेता है। अर्थात् खेचरी मुद्रा के द्वारा अमृतपान के फलस्वरूप वह अमरत्व की सिद्धि कर लेता है।
हे देवि! प्राण के साथ जिह्वा का संपीड़न कर ब्रह्मरन्ध्र में ध्यानावस्थित हो जाने वाले साधक को कभी मरण का भय नहीं सताता। मेरा यह कथन बिलकुल ही सत्य है।
उक्त प्रकार का योगाभ्यासी दूसरे कामदेव के समान रूपवान बन जाता है। उसे क्षुधा-पिपासा, निद्रा या मूर्च्छा रोग से क्लेशित नहीं होना पड़ता।
इस रीति से अभ्यास करने वाला पुरुष समस्त सांसारिक कष्टों से विरहित होकर स्वेच्छानुसार आचरण करने में सक्षम हो जाता तथा विपत्तियों की छाया से दूर रहता है।
ऐसे योगी में किसी प्रकार के पाप-पुण्य में फँसने की सम्भावना भी नहीं रह जाती और न ही उसे इस संसार में पुनर्जन्म ही लेना पड़ता है। वह देवलोक में देवताओं के साथ नित्य ही विहार किया करता है।
योगासन के अनेक भेद बतलाये गये हैं जिसमें मुख्यतया चौरासी आसनों को माना गया है, किन्तु उनमें भी चार आसन सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन और स्वस्तिकासन अतिविशिष्ट कहे गये हैं। इन आसनों के अभ्यास द्वारा नाड़ी-मल का विशुद्धिकरण हो जाता है। प्राणायाम-काल में वायु धारण करने पर साधक को कष्ट की प्रतीति नहीं होती। इन आसनों के प्रयोग से प्रधान नाड़ी शीघ्र ही वशवर्तिनी हो जाती है।
योगविद् साधक को चाहिए कि वह योनिस्थल को एक पैर की एड़ी से संपीड़ित कर दूसरे पैर की एड़ी को जननेन्द्रिय के मूल भाग में लगा ले।
तदनन्तर विजितेन्द्रियावस्था में अपने शरीर को एक सीध में रखकर दोनों भौहों के बीच में निर्निभेष दृष्टि (अपलक दृष्टि) जमा ले। ऐसे समय में उसके लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपने में किसी प्रकार की मानसिक विश्रृंखला न उत्पन्न होने दे। अर्थात् उसे शांत मन और निश्चल दृष्टि से आसन लगाकर बैठना चाहिए । इसे सिद्धगणों के लिए सिद्धिप्रदायक सिद्धासन के नाम से जाना जाता है।
इस प्रकार के अभ्यास से शीघ्र ही योग का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इस आसन का प्रयोग वायुरोधी अभ्यासकर्ता के लिए परमावश्यक है।
इसके परिणामस्वरूप साधक भुव-सागर से उत्तीर्ण होकर परमपद को पा लेता है। यह सिद्धासन समस्त आसनों में अत्यन्त गोपनीय एवं सर्वोत्तम माना जाता है। इसके ध्यानमात्र से ही योगी सभी पापों से विमुक्त हो जाता है।
सर्वप्रथम दोनों पैरों को सीधा फैलाकर उन्हें चेष्टापूर्वक जाँघ पर रख लें। पुनः दोनों हाथों को भी पैर की ही भाँति सीधा फैलाकर जाँघों के बीच में से निकालें और अपनी दृष्टि को नासिका के अगले भाग पर जमा लें।
तदनन्तर जिह्वा को दंतमूल में रखकर वक्षःस्थल पर ठुड्डी को बैठा ले तथा अधोवायु को ऊपर की ओर उत्थित कर शक्त्यानुसार धीरे-धीरे पूरक प्राणायाम द्वारा प्राणवायु को स्थिर करे।
तत्पश्चात् रेचक प्राणायाम द्वारा अवरुद्ध वायु को धीरे-धीरे निष्कासित कर दें। इसी प्रकार के अभ्यास को पद्मासन कहा जाता है।
यह पद्मासन समस्त रोगों का विनाशक और परम दुर्लभ होता है। इस आसन की प्रक्रिया का भलीभाँति ज्ञान रखने वाला साधक ही इसमें सफल हो सकता है।
पद्मासन के अभ्यासी साधक के प्राण समरूप होकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रविष्ट हो जाया करते हैं जिसके फलस्वरूप निःसन्देह ही साधक की साम्यावस्था हो जाती है।
देवी पार्वती से शिवजी कहते हैं कि पद्मासन लगाकर अपने प्राण-अपान वायु को एकीकृत कर लेने वाला साधक निश्चय ही इस संसार-सागर से पार उतर जाता है।
इस आसन का अभ्यास करने के लिए दोनों पैरों को परस्पर मिलाकर उन्हें फैला दें। पुनः दोनों हाथों से पैर के अँगूठों को कसकर पकड़ें और घुटने पर शिर को टिका दें।
इसी को उग्रासन कहां जाता है। इसके द्वारा वायु का प्रज्वलन तथा मृत्यु का भी निवारण होता है। इस आसन को पश्चिमोत्तान आसन के नाम से भी जाना जाता है,
क्योंकि इसके अभ्यासी का वायु पश्चिममार्गवाही होकर शरीर में संचरण करने लगता है। अतः प्रबुद्ध साधकों को प्रतिदिन इसका अभ्यास नियमपूर्वक करना चाहिए।
इस प्रकार के अभ्यासशील साधक में समस्त सिद्धियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। यह आसन परम गोपनीय है। इसे किसी अनधिकारी और अयोग्य व्यक्ति से नहीं बतलाना चाहिए।
इस आसन के परिणामस्वरूप वायु को शीघ्र ही वश में लाया जा सकता है तथा सभी प्रकार के रोगों और कष्टों से सहज ही छुटकारा मिल जाया करता है। अतएव आत्मसिद्धि हेतु इस आसन का अभ्यास प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य कहा गया है।
स्वस्तिकासन के लिए घुटनों और जाँघों के बीच में भली प्रकार से पैर के तलुए को जमाकर साम्यावस्था में बैठना ही स्वस्तिकासन कहा जाता है।
इस आसन के द्वारा साधक शरीरस्थ वायु को अविलम्ब वशवर्ती बना लेने में सक्षम हो जाता है। इसके द्वारा शरीर में रोगोत्पत्ति नहीं होती।
इस आसन को सहज रूप से सम्पन्न कर लिये जाने के कारण ही इसे सुखासन भी कहा जाता है। इस सर्वोत्तम आसन को सदैव ही गुप्त रखना उचित है।
Krishjan
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