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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 98
एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्वितीयकः । न क्षुधा न तृषा निद्रा नैव मूर्च्छा प्रजायते ।।
उक्त प्रकार का योगाभ्यासी दूसरे कामदेव के समान रूपवान बन जाता है। उसे क्षुधा-पिपासा, निद्रा या मूर्च्छा रोग से क्लेशित नहीं होना पड़ता।
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