मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 62
प्राणायामेन योगीन्द्रो लब्ध्वैश्वर्याष्टकानि वै । पापपुण्योदधिं तीर्खा त्रैलोक्यचरतामियात् ।।
उत्तम योगाभ्यासी पुरुष प्राणायाम की महत्ता के फलस्वरूप अष्टसिद्धियों (अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व तथा वशित्व) को हस्तगत कर इस संसार-सागर से पार चला जाता है और तब वह त्रैलोक्यं में अपनी इच्छा के अनुसार परिभ्रमण कर सकता है। यहाँ अष्टसिद्धियों की प्राप्ति का उल्लेख क्रमशः नीचे किया जा रहा है। अणिमा - मन में इच्छा करते ही शरीर को परमा परमाणु के समान सूक्ष्मतम बना लेना। गरिमा - हलका होते हुए भी इच्छामात्र से पर्वत से भी अधिक भारवान हो जाना। ईशित्व - सम्पूर्ण भौतिक पदार्थों के निर्माण एवं विनष्टीकरण की क्षमता का होना। महिमा - इच्छामात्र से शरीर को विस्तृत कर लेना ही महिमा सिद्धि कहलाती है। लघिमा - अत्यधिक भारवान होकर भी हलका-फुल्‌का प्रतीत होना प्राप्ति-मनोनुकूल पदार्थों की तत्क्षण होने वाली उपलब्धि। प्राकाम्य - संकल्पमात्र से अभिलषित वस्तु की परिपूर्णता। वशित्व - किसी को अपने वशवर्ती बना लेने की समर्थता।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें