तत्पश्चात् निरन्तर अभ्यास-रत रहने वाले योगी में परिचयावस्था का आविर्भाव हो जाता है। जिस समय वायु इड़ानाड़ी (चन्द्रनाड़ी) पिंगला नाड़ी (सूर्यनाड़ी) का परित्याग कर अचल हो उठता है तब वह परिचित वायु सुषुम्ना मार्ग से आकाश में संचरण करने लगता है। ऐसी स्थिति में क्रियाशक्तिग्राही योगी चक्रभेदन में निश्चय ही सामर्थ्यवान बन जाता है।
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