मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 88
रसनामूर्ध्वगांः कृत्वा यश्चन्द्रे सलिलं पिबेत् । मासमात्रेण योगीन्द्रो मृत्युं जयति निश्चितम् ।।
जो योगी अपनी जिह्वा को ऊपर की ओर उठाकर चन्द्रमा से स्रवित होते हुए अमृत का रसास्वादन करता है वह निश्चित रूप से एक महीने के अन्दर ही मृत्यु पर विजय पा लेता है। जीभ को उलटकर गलघंटिका के पीछे तालुमूल में लगाकर उससे टपकते हुए अमृत का पान करना खेचरी मुद्रा कहलाती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें