जो योगी अपनी जिह्वा को ऊपर की ओर उठाकर चन्द्रमा से स्रवित होते हुए अमृत का रसास्वादन करता है वह निश्चित रूप से एक महीने के अन्दर ही मृत्यु पर विजय पा लेता है। जीभ को उलटकर गलघंटिका के पीछे तालुमूल में लगाकर उससे टपकते हुए अमृत का पान करना खेचरी मुद्रा कहलाती है।
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