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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 71
दण्डाष्टकं यदा वायुर्निश्चलो योगिनो भवेत् । स्वसामर्थ्यात्तदांगुष्ठे तिष्ठेद्वातुलवत् सुधीः ।।
किन्तु उसे इस अलौकिक शक्ति की गोपनीयता बनाये रखने के लिए अपनी विक्षिप्तावस्था प्रकट करनी चाहिए। अर्थात् योगी को अपनी शक्तिसम्पन्नता का प्रदर्शन कदापि नहीं करना चाहिए।
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