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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 101
चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानाविधानि च । तेभ्यश्चतुष्कमादाय मयोक्तानि ब्रवीम्यहम् । सिद्धासनं ततः पद्मासनं चोग्रं च स्वस्तिकम् ।।
योगासन के अनेक भेद बतलाये गये हैं जिसमें मुख्यतया चौरासी आसनों को माना गया है, किन्तु उनमें भी चार आसन सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन और स्वस्तिकासन अतिविशिष्ट कहे गये हैं। इन आसनों के अभ्यास द्वारा नाड़ी-मल का विशुद्धिकरण हो जाता है। प्राणायाम-काल में वायु धारण करने पर साधक को कष्ट की प्रतीति नहीं होती। इन आसनों के प्रयोग से प्रधान नाड़ी शीघ्र ही वशवर्तिनी हो जाती है।
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