गृहीत्वा चेतनां वायुः क्रियाशक्तिं च वेगवान् ।
सर्वान् चक्रान् विजित्वा च ज्ञानशक्ती विलीयते ।।
वह समाधि की अवस्था में जिसका चिन्तन करता है उसी में उसके चित्त का विलय भी हो जाया करता है। ऐसा योगाभ्यासी मन, वायु और क्रियाशक्ति के साथ सभी चक्रों का भेदन कर अन्त में ब्रह्मज्ञान में समाहित हो जाता है।
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