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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 50
यदा संजायते स्वेदो मर्दनं कारयेत्सुधीः । अन्यथा विग्रहे धातुर्नष्टो भवति योगिनः ।।
उस क्षण उसके लिए यह आवश्यक होता है कि वह देहनिर्गत पसीने को शरीर में ही मलकर सुखा ले। यदि वह ऐसा करने से हिचकता है तो उसके शरीरस्थ धातुओं का विनाश हो जाता है।
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