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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 7
हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले । उदानः कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः ।।
अब यहाँ पंच प्राणों के वासस्थान तथा अन्य पाँच वायुओं के कार्यक्षेत्र का कथन किया जा रहा है जो इस प्रकार से है - हृत्प्रदेश में प्राणवायु, गुदाद्वार में अपान वायु, नाभिस्थल में समान वायु, कंठप्रदेश में उदान वायु तथा सम्पूर्ण शरीर में व्यान वायु परिव्याप्त होकर भ्रमणशील रहता है।
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