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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 103
ऊर्ध्वं निरीक्ष्य भ्रूमध्यं निश्चलः संयतेन्द्रियः । विशेषोऽ वक्रकायश्च रहस्युद्वेगवर्जितः । एतत्सिद्धासनं ज्ञेयं सिद्धानां सिद्धिदायकम् ।।
तदनन्तर विजितेन्द्रियावस्था में अपने शरीर को एक सीध में रखकर दोनों भौहों के बीच में निर्निभेष दृष्टि (अपलक दृष्टि) जमा ले। ऐसे समय में उसके लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपने में किसी प्रकार की मानसिक विश्रृंखला न उत्पन्न होने दे। अर्थात् उसे शांत मन और निश्चल दृष्टि से आसन लगाकर बैठना चाहिए । इसे सिद्धगणों के लिए सिद्धिप्रदायक सिद्धासन के नाम से जाना जाता है।
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