तदनन्तर दाहिने हाथ के अँगूठे द्वारा पिंगला नाड़ी (दायाँ नासिकारन्ध्र) को रोककर इड़ा नाड़ी (चन्द्रनाड़ी, वाम नासापुट) से वायु को शक्त्यानुसार ऊपर की ओर खींचकर कुछ क्षण तक उसे रोके रहें। पुनः उसे पिंगला नाड़ी (सूर्यनाड़ी) द्वारा धीरे-धीरे बहिर्गत कर दें। अर्थात् वाम नासा से पूरक प्राणायाम (श्वास को ऊपर की ओर खींचना) करने के पश्चात् कुम्भक प्राणायाम (कर्षित वायु को रुद्ध करना) करें। तत्पश्चात् वाम नासिका से रेचक प्राणायाम (दाएँ नासारन्ध्र से। शनैः शनैः अवरुद्ध वायु का निष्कासन) करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि पूरक, कुम्भक और रेचक - ये तीनों ही प्राणायाम के अभिन्न अंग मानें गये हैं।
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