अत्यल्पं बहुधा भुक्त्वा योगी न व्यथते हि सः ।
अथाभ्यासवशाद्योगी भूचरों सिद्धिमाप्नुयात् ।
यथा दर्दुरजन्तूनां गतिः स्यात्पाणिताडनात् ।।
ऐसी अवस्था में साधक द्वारा अतिभोजन या लघुभोजन किये जाने पर भी उसे कष्ट का अनुभव नहीं होता, बल्कि अभ्यास के फलस्वरूप उसमें भूचरी विद्या की सिद्धि आ जाती है। अर्थात् जिस प्रकार मेढ़क अपने हाथ पटककर भूमि में प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार योगी भी हस्तताड़नमात्र से ही भूमि में प्रवेश कर जाता है।
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