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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 99
अनेनैव विधानेन योगीन्द्रोऽ वनिमण्डले । भवेत्स्च्छन्दचारी च सर्वापत्परिवर्जितः ।।
इस रीति से अभ्यास करने वाला पुरुष समस्त सांसारिक कष्टों से विरहित होकर स्वेच्छानुसार आचरण करने में सक्षम हो जाता तथा विपत्तियों की छाया से दूर रहता है।
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