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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 11
भवेद्वीर्यवती विद्या गुरुवक्त्रसमुद्भवा । अन्यथाफलहीनास्यान्निर्वीर्याप्यतिदुःखदा ।।
गुरुमुख से श्रवण की हुई विद्या निश्चय ही फलवती सिद्ध होती है। गुरुवाणी से रहित विद्या सर्वदा ही निष्क्रिय और फलविहीन होती है। यदि गुरुज्ञान से हीन योगाभ्यासी किसी के अनुकरणवश योग साधन करने लगे तो वैसी साधना उसके लिए कष्टकारिणी बन जाती है।
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