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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 69
यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मेति भावयेत् । वैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदिन्द्रियजयो भवेत् ।।
योगी में जिन-जिन पदार्थों का ज्ञान हो, उसे उन-उन पदार्थों में आत्मभावना रखनी चाहिए। जिस इन्द्रिय की सहायता से जिस वस्तु का बोध होता हो, उसमें आत्मभाव रखने से इन्द्रिय पर विजयश्री मिलती है। अर्थात् जिस प्रकार नेत्र के द्वारा रूप, कर्ण के द्वारा शब्द या प्राण के द्वारा गंधादि का बोध होता है उसी प्रकार उन सब में आत्मभाव रखने पर वे इन्द्रियाँ अपने विषयों का ग्रहण नहीं करेंगी। तात्पर्य यह है कि विषयों से विमुख रहने पर स्वतः ही इन्द्रियों पर विजय-लाभ हो जायगा।
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