न तस्य पुनरावृत्तिमर्मोदते स सुरैरपि ।
पुण्यपापैर्न लिप्येत एतदाचरणेन सः ।।
ऐसे योगी में किसी प्रकार के पाप-पुण्य में फँसने की सम्भावना भी नहीं रह जाती और न ही उसे इस संसार में पुनर्जन्म ही लेना पड़ता है। वह देवलोक में देवताओं के साथ नित्य ही विहार किया करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।