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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 33
एनआरम्भभटकश्चैव यथा परिचयस्तदा । निष्पत्तिः सर्वयोगेषु योगावस्था भवन्तिताः ।।
उसके शरीर में सुगन्धि तथा मुखमण्डल पर तेजस्विता की कान्ति झलकने लगती है। ऐसी अवस्था आने पर उसके स्वर में भी मिठास आ जाती है। इन प्रारम्भिक लक्षणों के साथ-साथ उसे योग का पूर्णरूपेण ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इसी को योगावस्था भी कहा जाता है।
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