तत्पश्चात् इड़ा नाड़ी से अवरुद्ध वायु का निष्कासन धीरे-धीरे करें। वायु को निकालते समय शीघ्रता न करें। इस रीति से बीस बार आलस्यरहित होकर कुम्भक प्राणायाम करने वाला साधक सभी द्वन्द्वों से विमुक्त हो जाता है। अभिप्राय यह है कि कुम्भक प्राणायाम का अभ्यास क्रमशः बढ़ाता हुआ उस पर अपना आधिपत्य कर ले तो वह समस्त क्लेशों से छूट जाता है।
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