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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 105
येन संसारमुत्सृज्य लभते परमां गतिम् । नातः परतरं गुह्यमासनं विद्यते भुवि । येनानुध्यानमात्रेण योगी पापाद्विमुच्यते ।।
इसके परिणामस्वरूप साधक भुव-सागर से उत्तीर्ण होकर परमपद को पा लेता है। यह सिद्धासन समस्त आसनों में अत्यन्त गोपनीय एवं सर्वोत्तम माना जाता है। इसके ध्यानमात्र से ही योगी सभी पापों से विमुक्त हो जाता है।
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