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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 58
ततो रहस्युपाविष्टः साधकः संयतेन्द्रियः । प्रणवं प्रजपेद्दीर्घ विघ्नानां नाशहेतवे ।।
अपने सम्मुख उपस्थित विघ्नों के शमनार्थ साधक को अपनी इन्द्रियों का दमन करना आवश्यक होता है। इसके साथ ही उसे किसी एकांत स्थान में बैठकर उच्च स्वर से प्रणव मंत्र का जाप मन लगाकर करना उचित है।
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