पद्मासन के अभ्यासी साधक के प्राण समरूप होकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रविष्ट हो जाया करते हैं जिसके फलस्वरूप निःसन्देह ही साधक की साम्यावस्था हो जाती है।
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