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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 86
काकचच्वा पिबेद्वायुं शीतलं यो विश्वंक्षणः । आपणापानविधानज्ञः सः भवेन्मुक्तिभाजनः ।।
यदि प्राण-अपान का विधि-विधिज्ञ साधक अपने होंठ को कौए की चोंच के समान लम्बोतरा बनाकर शीतलं वायु को पान करे तो वह निश्चय ही मोक्ष का अधिकारी हो जाता है।
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