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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 87
सरसं यः पिबेद्वायुं प्रत्यहं विधिना सुधीः। नश्यन्ति योगिनस्तस्यः श्रमदोहजरामयाः ।।
जो पुरुष विधानपूर्वक नित्यप्रति रसान्वित वायु का पान करता है, उसके श्रम (परिश्रम से उत्पत्र होने वाली थकावट), दाह (शारीरिक जलन) तथा जरा (वृद्धावस्था) आदि सभी रोग निर्मूल हो जाते हैं। अर्थात् उसे उक्त प्रकार के कष्टदायक रोग नहीं झेलने पड़ते।
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