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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 32
समकायः सुगन्धिश्च सुकान्तिः स्वरसाधकः ।।
नाड़ीशुद्धि के पश्चात् योगी का शरीर साम्यावस्था में आ जाता है। अर्थात् उसकी देह में स्थूलता, दुर्बलता या वक्रता नहीं रह जाती और सभी अंग एक समान दीख पड़ने लगते हैं।
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