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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 57
सन्त्यत्र बहवो विघ्ना दारुणा दुर्निवारणाः । तथापि साधयेद्योगी प्राणैः कण्ठगतैरपि ।।
योगसाधना काल में साधक के समक्ष ऐसी अनेक प्रकार की बाधाएँ आती रहती हैं जिनका निवारण करना अत्यन्त दुष्कर होता है। ऐसी स्थिति में भी साधक को निराश न होकर अपनी साधना में तब तक संलग्न रहना चाहिए जब तक प्राण कंठ तक न आ जाय।
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