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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 2
प्राणो वसति तत्रैव वासनाभिरलंकृतः । अनादिकर्मसंश्लिष्टः प्राप्याहङ्कार संयुतः ।।
इसी कमल में अनादि कर्म से परिप्लुत तथा अहंकारपूर्ण वासना से परिपूरित प्राण का निवासस्थल माना जाता है।
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