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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 38
स्तेषं हिंसा जनद्वेषं चाहङ्कारमनार्जवम् । उपवासमसत्यञ्च मोहञ्च प्राणपीडनम् ।।
किसी की वस्तु की चोरी करना, जीवहिंसा, मानव के प्रति विद्वेष, अहंकार, प्राणिमात्र के प्रति प्रेग्राभाव, व्रतोपवास, मिथ्या भाषण, मोहग्रस्तता, प्राणों का परिपीड़न,
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