अनिलोऽर्कप्रवेशे च भोक्तप्ठ्यं योगिभिः सदा ।
वायौ प्रविष्टे शशिनि शयनं साधकोत्तमैः ।।
योगी को दक्षिण नासापुटस्थ पिंगला नाड़ी (सूर्यनाड़ी) के प्रवहमान रहने पर भोज्य पदार्थों का ग्रहण तथा वाम नासापुटस्थ इड़ा नाड़ी (चन्द्रनाड़ी) के प्रवाहित रहने पर शयन करना उचित कहा गया है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।