इस प्रकारः गुदाद्वार, शिश्न, नाभिस्थल, हृदय, कण्ठप्रदेश और भौहों के मध्य स्थित षट्चक्रों में वायुधारण के अभ्यास को सिद्ध कर लेने वाला योगी अविनश्वर हो जाता है। अर्थात् उसका विनाश पंचभूतों के द्वारा कभी सम्भव नहीं होता।
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