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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 96
रसनामूर्द्धगां कृत्वा क्षणार्थं यदि तिष्ठति । क्षणेन मुच्यते योगी व्याधिमृत्युजरादिभिः ।।
यदि योगी अपनी जिह्वा का क्षणार्थ मात्र पलटकर तालुमूल में लगा ले तो वह सभी रोगों से विमुक्त होकर वृद्धावस्था पर विजय पा लेता है। अर्थात् खेचरी मुद्रा के द्वारा अमृतपान के फलस्वरूप वह अमरत्व की सिद्धि कर लेता है।
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