श्रद्धयात्मवतां पुंसां सिद्धिर्भवति नान्यथा ।
अन्येषां च न सिद्धिः स्यात्तस्माद्यत्नेन साधयेत् ।।
इस प्रकार श्रद्धासमन्वित होकर कार्य करने वाले शिष्य को अवश्य ही सिद्धि मिलती है, किन्तु इसके विपरीत अश्रद्धालु को कभी भी सफलता नहीं मिलती। प्रत्येक साधक को चेष्टावान् होकर अपनी साधना पूर्ण करनी चाहिए। साष्टांग प्रणाम निवेदित करने का विधान शास्त्रों में निम्न प्रकार से किया गया है-
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