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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 116
गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्य कस्यचित् । येन शीघ्र मरुत्सिद्धिर्भवेदुःखौधनाशिनी ।।
इस आसन के परिणामस्वरूप वायु को शीघ्र ही वश में लाया जा सकता है तथा सभी प्रकार के रोगों और कष्टों से सहज ही छुटकारा मिल जाया करता है। अतएव आत्मसिद्धि हेतु इस आसन का अभ्यास प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य कहा गया है।
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