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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 54
अरोगित्वमदीनत्वं योगिनस्तत्त्वदर्शिनः । स्वेदो लाला कृमिश्चैव सर्वचैव न जायते ।।
तत्ववेत्ता योगियों में शारीरिक और मानसिक व्यथा का बोध नहीं होता और न तो उसके शरीर से पसीना ही छूटत्ता है। मुख से लार भी नहीं टपकती और न ही उसमें उदरकृमियों की उत्पत्ति होती है।
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